आत्मा आध्यात्मिक शक्तिओ का स्तोत्र है| अध्यात्मिक विकास यात्रा में साधक कई सिद्धियों प्राप्त करता है| “शतावधान” उन्ही सिद्धियों में से एक है| अवधान केवल यद् शक्ति को तीव्र बनाने की क्रिया नहीं है, किन्तु आत्मा की सर्व शक्तिओ का व्याप बढ़ाने की प्रक्रिया है| शत-अवधान (शत यानी १००/१०० और अवधान अर्थात याद रखना) का अर्थ है, एक ही समय पर १०० भिन्न गतिविधियों, बातों या चीजो पर ध्यान केन्द्रित करना| यह स्थिती जो व्यक्ति प्राप्त करते है उन्हें “शतावधानी” कहते है| शतावधानी १०० व्यक्तिओ द्वारा बोली गई, दिखाई गई, चीजे, बाते कोई भी क्रम में याद रख सकते है| जैन धार्मिक परंपरा अनुसार शतावधानी की स्थिती को प्राप्त करनेके लिए कठिन तप, त्याग, संयम और ध्यान का आचरण (पालन) करना पड़ता है| इसी वजह से अंगुली पे गिन सके उतने ही शतावधानी नाम इतिहास में पाए गए है| आधुनिक विज्ञान के मुताबिक सामान्य मनुष्य अपनी मानसिक शक्ति में से सिर्फ ५% से १०% शक्ति का उपयोग कर पाता है| जब की शत-अवधानी पूर्ण एकाग्र ध्यान केन्द्रित कर अपनी मानसिक शक्ति का वस्तुत: उपयोग कर सकते है| कई ऐसे सिद्धिवंत आत्माएं भी है| जिन्होंने महत्तम उच्च शक्तिओ को प्राप्त करने के लिए अपनी सिद्धियों का प्रयोग सामान्य मनुष्यों के सामने नहीं किया|

शतावधानी की इस स्थिती को प्राप्त करनेवाला युवा मुनि पूज्य अजितचंद्रसागरजी महाराज साहेब, यह शक्ति की विकास यात्रा में पांच गुना आगे पहुच गए है| अर्थात ये अब “अर्धसहस्त्रावधानी” बन गए है| (५०० अवधान) किसी भी क्रम में पूछे गये ५०० प्रश्नों के उत्तर वे एक समय पर दे सकते है|